| Der hochmütige, gestürzte und wieder erhabene CROESUS. Musikalisches Schauspiel. Libretto: Lucas von Bostel. Muziek: Reinhard Keiser. Hamburg, Theater am Gänsemarkt, 1711 / 1730. (Jeroen Fonteyn) |
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CROESUS: LIBRETTO |
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LUCAS VON BOSTEL |
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ATTO I |
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Scena 1 |
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Der Schauplatz stellet vor einen prächtigen Saal und herrlichen Thron. |
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Croesus auf dem Thron. Orsanes, Eliates, Halimacus und viele andere |
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lydische Staats- und Kriegsbediente, alle knieend; Solon allein stehend. |
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1a |
coro |
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ALLE |
1 |
Croesus herrsche, Croesus lebe, |
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daß der Glanz von seinem Glücke |
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macht- und hoheitsstolze Blicke |
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um den ganzen Erdkreis gebe. |
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1b |
recitativo |
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CROESUS |
1 |
Ihr edlen Lydier, getreue Untertanen, |
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ich hoffe, daß durch eure Tapferkeit |
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ihr mir den Weg nach dieser Zeit |
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zum Götterstande werdet bahnen. |
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5 |
Indessen nehm ich gnädigst an |
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die Lieb und Treu, so ich hie spüren kann. |
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(Winkt, daß sie sich aufrichten sollen, und wendet sich zu Solon.) |
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Nur Solon traurt allein, |
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und hat der helle Schein |
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von meiner Macht und Herrlichkeit |
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10 |
ihn niemals noch erfreut? |
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SOLON |
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Den glänzenden Kristall |
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zerbricht ein Unglücksfall. |
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CROESUS |
|
Hat Solon nicht gesehn |
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die vielen Kriegesscharen, |
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15 |
die mir zu Dienste stehn |
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und meinen Thron bewahren? |
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SOLON |
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Es können die Ameisen |
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noch viel mehr Scharen weisen. |
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CROESUS |
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Schau an die reiche Wand, |
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20 |
das prächtige Gebäude, |
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bedeckt mit lauter Seide |
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durch kunsterfahrne Hand. |
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SOLON |
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Ist das denn deine Pracht, |
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die dir ein Würmlein macht? |
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CROESUS |
25 |
Es zeiget dir mein Reich |
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den Kern von tapfern Leuten, |
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die mir hier stehn zur Seiten. |
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SOLON |
|
Der Tod macht alle gleich. |
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CROESUS |
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Schau, wie das Gold an meinem Zepter prahlt |
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30 |
und mir sein Glanz die Hand bestrahlt. |
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SOLON |
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Das Gold ist nur ein Raub, |
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der Erde Gruft entführet, |
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die Hand, damit gezieret, |
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ist nichts als Asch' und Staub. |
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CROESUS |
35 |
Wird alle diese Pracht |
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von dir sogar verlacht, |
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|
laß meine Schätze sehen! |
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|
Die Türen der Schatzkammer werden aufgetan. |
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Schau, Solon, schau, tritt näher hin |
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und sag, ob ich nicht glücklich bin. |
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40 |
Schau! SOLON Es ist gnug geschehen! |
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(siehet nur ein wenig hin und wendet sich alsobald wieder um.) |
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CROESUS |
|
Kann nicht, der das besitzt, glückselig heißen? |
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SOLON |
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Du irrest weit, |
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meinst du, dies sei Glückseligkeit? |
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Du bist nicht Herr der Schätz und Güter |
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45 |
es setzet dich das Glück |
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|
darüber nur zum Hüter, |
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|
und kann ein Unglücksblick |
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|
dir alles wiederum entreißen. |
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|
(geht ab.) |
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CROESUS (vom Throne absteigend) |
||
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|
Geh hin mit deinen Lehren, |
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50 |
die mir verdrießlich sind zu hören. |
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1c |
aria |
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CROESUS |
1 |
Prangt die allerschönste Blume |
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|
nicht mehr mit der Schönheit Ruhme |
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wenn die welken Blätter fließen |
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sollte man die kurze Zeit |
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5 |
ihrer schönen Lieblichkeit |
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|
darum nicht mit Lust genießen? |
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Scena 2 |
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|
Königlicher Garten. Elmira und Trigesta. |
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2a |
aria |
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ELMIRA |
1 |
Hoffe noch, gekränktes Herz! |
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|
Furcht und Schmerz, |
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|
|
warfen mein Vertrauen nieder. |
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|
Doch die Liebe tröstet mich, |
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5 |
tröstet und erhebt mich wieder. |
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|
Manchmal folgt auf bange Triebe |
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|
plötzlich wieder Lust und Scherz. |
|
|
|
Hoffe noch, gekränktes Herz! |
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2b |
recitativo |
|
ELMIRA |
1 |
Du weißt, wie Cyrus' Macht |
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|
ganz Medien hat überschwommen, |
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|
die wertste Mutter als verwitt'bte Königin |
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|
von Reich und Thron gebracht, |
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5 |
hier werden wir von Croesus aufgenommen. |
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Prinz Atis gegen mich in keuscher Lieb entzündet, |
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|
und dies ist der Gewinn, |
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|
worauf sich meine Hoffnung gründet. |
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|
Hab ich mein Erbreich dort verloren, |
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10 |
so werd ich hier zur Königin erkoren. |
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TRIGESTA |
|
Der Prinz ist wiederum von ihr geliebt? |
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ELMIRA |
|
Du hast es gnug verspüret. |
|
TRIGESTA |
|
Wie macht er's, da er stumm, daß er ihr Herze rühret |
|
|
|
und seine Liebe zu erkennen giebt? |
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|
2c |
arietta |
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ELMIRA |
1 |
Empfinden gleiche Schmerzen |
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|
zwei treu verliebte Herzen, |
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|
darf es der Sprache nicht; |
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|
es zeugen gnug die Triebe |
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5 |
von ihrer reinen Liebe |
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|
durch Aug' und Angesicht. |
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TRIGESTA |
|
Ich merke schon die Possen, |
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|
die Zung' ist zwar verschlossen, |
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|
doch sind die Lippen frei. |
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|
10 |
Er will mit süssen Küssen |
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|
|
ihr g'nug zu sagen wissen, |
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|
|
daß er verliebet sei. |
|
|
2d |
recitativo |
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ELMIRA |
1 |
Halt ein mit deinen Scherzen! |
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|
Orsanes kommt, der Mehrer meiner Schmerzen. |
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|
Scena 3 |
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|
Orsanes, Elmira, Trigesta. |
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3a |
aria |
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ORSANES |
1 |
Lieben, Leiden, Bitten, Flehen, |
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|
ist bei dir sogar umsonst, |
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|
daß ich deiner Widergunst |
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|
noch nicht einen Blick gesehen. |
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|
5 |
Kann ein Herz von Stahl und Stein |
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|
bei so großer Schönheit sein? |
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|
3b |
recitativo |
|
ELMIRA |
1 |
Prinz Atis, wie dir ist bewußt, |
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|
|
herrscht nur allein in meiner Brust. |
|
ORSANES |
|
Muß meiner Hoffnung Brunst dann so erkalten? |
|
ELMIRA |
|
Das Faule schneid't man ab, das Gute zu erhalten. |
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TRIGESTA |
5 |
Wollt er vergnüget sein mit einer hübschen Alten! |
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ORSANES |
|
Unseliger! daß ich dich lieben muß! |
|
ELMIRA |
|
Es ist des Himmels Schluß, |
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|
|
ich kann nur einen lieben. |
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TRIGESTA |
|
Es ist mit mir bei einem nie geblieben. |
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|
(geht ab.) |
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|
Scena 4 |
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|
Halimacus von ferne, Orsanes, Elmira. |
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4a |
recitativo |
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ORSANES |
1 |
Ist denn ein Stummer liebenswert? |
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ELMIRA |
|
Die Tugend wird geehrt, |
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|
|
und nicht der Stimmen Schall. |
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ORSANES |
|
So liebe dann ein hölzern Bild, |
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5 |
wo du was Stummes lieben willt. |
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ELMIRA |
|
Liebst du die Stimm, so liebe Echos Widerhall. |
|
ORSANES |
|
Was kannst du von ihm hoffen? |
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|
|
Die Türen stehn mir offen |
|
|
|
zu diesem Thron, wann mir's gefällt. |
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|
10 |
Ich habe Freunde, Macht und Geld. |
|
ELMIRA |
|
Wer keine Treu besitzt, hat gar nichts in der Welt. |
|
ORSANES |
|
Er kann nicht zur Regierung kommen, |
|
|
|
weil das Gebieten ihm ist mit der Sprach entnommen. |
|
ELMIRA |
|
Ein Fürst gebeut durch seiner Diener Mund. |
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15 |
Es spricht für ihn Vergeltung bei den Frommen, |
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|
den Bösen macht die Straf' auch seinen Willen kund. |
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|
Die stille Gravität steht Großen besser an, |
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|
weil das Gesetz für sie gnug reden kann. |
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ORSANES |
|
Was will ein Fürst, der nur mit Winken spricht? |
|
ELMIRA |
20 |
Ein treuer Diener merkt den Willen am Gesicht. |
|
ORSANES |
|
Wohlan, Halsstarrige, hilft jetzt kein Flehen, |
|
|
|
ich hoff', es kömmt die Zeit, |
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|
daß auch du deine Schuldigkeit |
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|
gehorsamst mir wirst aus den Augen sehen. |
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|
(geht ab.) |
|
HALIMACUS (tritt hervor) |
||
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25 |
Ich preise die Beständigkeit, |
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die ich verspür, und bin bereit, |
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|
bei meinem Prinzen zu erlangen, |
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|
daß Treu und Untreu soll verdienten Lohn empfangen, |
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|
Orsanes Schand und Hohn, |
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30 |
Elmira Thron und Kron. |
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ELMIRA |
|
Die Treu und Tugend ist für sich gnugsamer Lohn. |
|
|
4b |
aria |
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HALIMACUS |
1 |
Wahre Treu kann nicht auf Erden |
|
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|
bei den Menschen dieser Zeit |
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|
nach Verdienst belohnet werden; |
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|
und die seltne Redlichkeit |
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|
5 |
muß man über alles setzen, |
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|
|
mehr als Kron' und Zepter schätzen. |
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|
Scena 5 |
|
|
|
Atis stumm, Halimacus, Elmira, Nerillus. Atis kommt von weitem |
|
|
|
mit holdseligen und freudigen Gebärden. |
|
|
5a |
recitativo |
|
HALIMACUS |
1 |
Prinz Atis kommt. |
|
|
5b |
aria |
|
ELMIRA |
1 |
Er erweckt in meinem Herzen |
|
|
|
durch sein helles Angesicht, |
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|
|
neue Freude, neues Licht. |
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Wie von Titans güldnen Kerzen, |
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5 |
wenn der frühe Tag anbricht, |
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|
durch der stummen Strahlen Macht |
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|
die betraumte Welt erwacht. |
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5c |
recitativo |
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|
Atis zeigt durch Gebärden, daß ihm Halimacus beunruhigt fürkommt. |
|
HALIMACUS |
1 |
Ich merke deinen Sinn, |
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du spürest, daß ich traurig bin. |
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Atis zeigt, daß er die Ursache wissen wolle. |
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|
Du fragst, was mir sei widerfahren, |
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|
|
zu seiner Zeit will ich dies offenbaren. |
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|
5 |
Ein weiser Arzt wird keinem Schwachen |
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|
|
der Krankheit Ursprung kundbar machen, |
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|
|
wofern er Sorge trägt, |
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|
|
daß sich dadurch die Krankheit mehr erregt. |
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|
|
Ich habe dich in deiner Jugend |
|
|
10 |
bishero stets nach Wunsch regiert, |
|
|
|
und hoffe, daß die wahre Tugend, |
|
|
|
die ich in allen deinen Tun verspürt, |
|
|
|
wird nimmermehr erkalten, |
|
|
|
und dich hinfort in steten Glück erhalten. |
|
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15 |
Indessen bleib ich dir getreu in Rat und Tat |
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|
|
und bitte lieb Elmir, weil sie's verdienet hat. |
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|
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Scena 6 |
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|
Atis, Elmira, Nerill. |
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6a |
recitativo |
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ELMIRA |
1 |
Verliebter Prinz, obgleich dein Mund nicht spricht, |
|
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|
so sagt mir doch dein holdes Angesicht, |
|
|
|
daß deine Brust von Lieb' entzündet |
|
|
|
bei mir Vergnügung findet. |
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|
6b |
aria |
|
ELMIRA |
1 |
Sobald dich nur mein Auge sah, |
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|
empfand ich Liebespein. |
|
|
|
Und du desgleichen, sag mir? |
|
|
|
Atis winkt ja |
|
|
|
liebst auch kein andre? |
|
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|
Atis winkt nein |
|
|
5 |
So wohn ich dir im Herzen? |
|
|
|
winkt zu |
|
|
|
und sonst kein andre? |
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|
6c |
recitativo |
|
ELMIRA |
1 |
Was zeigt der Prinz, geliebter Knabe? |
|
NERILL |
|
Weil aus Gewohnheit ich erlernet habe, |
|
|
|
durch Winken zu verstehen sein Begehren, |
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|
so will er, daß ich dir sein Herze soll erklären. |
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|
6d |
ritornello |
|
|
|
Atis macht unterschiedliche Bewegungen auf die Weise folgender Aria, |
|
|
|
welche indessen gespielet wird. |
|
|
6e |
recitativo |
|
ELMIRA |
1 |
Was hast du jetzt gesehen? |
|
NERILL |
|
So ist es zu verstehn: |
|
|
6d |
aria |
|
NERILL |
1 |
Durch der Haare güldne Stricke |
|
|
|
ist ans Herz ein Band gelegt. |
|
|
|
Durch der Augen holde Blicke |
|
|
|
ist die Brust in Brand erregt. |
|
|
5 |
Dennoch leb ich höchst vergnügt |
|
|
|
und begehre kein Erretten |
|
|
|
aus den güldnen Band' und Ketten |
|
|
|
dran mein Herz in Flammen liegt. |
|
|
|
Atis bekräftigt dieses mit Gebärden. |
|
|
6f |
recitativo |
|
ELMIRA |
1 |
Die dich bestrickt, |
|
|
|
ist selbst nicht frei |
|
|
|
und hält sich höchst beglückt |
|
|
|
in ihrer Sklaverei. |
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|
Scena 7 |
|
|
|
Elcius und Vorige. |
|
|
7a |
recitativo |
|
ELCIUS |
1 |
Der König will euch gerne sprechen, |
|
|
|
wo ihr der Courtesie ein wenig ab könnt brechen. |
|
|
|
Atis zeigt, daß er scheiden müsse. |
|
|
7b |
aria a due |
|
ELMIRA |
1 |
Du mußt scheiden, doch indessen |
|
|
|
eh du scheidest, gib Gehör. |
|
|
|
Wilt du meiner auch vergessen? |
|
NERILL |
|
Nein, nein, sagt er, nimmermehr. |
|
ELMIRA |
5 |
Wirst du einer andern können, |
|
|
|
wann's gleich eine Göttin wär, |
|
|
|
Hoffnung deiner Liebe gönnen? |
|
NERILL |
|
Nein, nein, sagt er, nimmermehr. |
|
|
|
Atis und Elmira gehen ab. |
|
|
|
Elcius erhascht Nerill und hält ihm, daß er folgenden Satz mit ihm singe. |
|
ELCIUS |
|
Sag, mein Magen, sag indessen, |
|
|
10 |
plagt dich Durst und Hunger sehr? |
|
|
|
Willst du wohl ein Brätlein essen? |
|
NERILL |
|
Ja, ja, sagt er, noch viel mehr. |
|
ELCIUS |
|
Wirst du einem Stübchen können, |
|
|
|
wenn's gleich guter Rheinwein wär, |
|
|
15 |
Herberg willig in dir gönnen? |
|
NERILL |
|
Ja, ja, sagt er, noch viel mehr. |
|
|
7c |
recitativo |
|
ELCIUS |
1 |
Ha, bon Garçon, der Baurenhäuter |
|
|
|
weiß recht hauptsächlich meinen Sinn, |
|
|
|
daß ich ein guter Schlucker bin |
|
|
|
und tausendmal gescheuter |
|
|
5 |
als mein Herr Atis ist. |
|
|
|
Der Wurm ist von der Liebe so besessen, |
|
|
|
daß er dafür das Trinken und das Essen |
|
|
|
fast ganz und gar vergißt. |
|
|
|
Man wird durch andrer Schaden klug, |
|
|
10 |
drum bin ich sicher gnug, |
|
|
|
daß Liebe nicht bei mir kann hausen. |
|
|
|
Ich halte gar zu viel vom Schmausen. |
|
|
|
|
|
|
|
Scena 8 |
|
|
|
Orsanes, Eliates. |
|
|
8 |
aria a due |
|
ELIAT./ORSAN. |
1 |
Ich sä' auf wilde Wellen, |
|
|
|
ich bau' auf dürren Sand. |
|
ELIATES |
|
So wird das Unglücksband |
|
|
|
im Lieben uns gesellen |
|
|
5 |
durch steten Widerstand. |
|
ELIAT./ORSAN. |
Ich sä' auf wilde Wellen, |
|
|
|
|
ich bau' auf dürren Sand. |
|
|
|
|
|
|
|
Scena 9 |
|
|
|
Elmira, Clerida von ferne, Orsanes, Eliates. |
|
|
9a |
aria a due |
|
|
|
(Kommen von Ferne singend) |
|
CLERIDA |
1 |
Blindes Feu'r, das mich verzehret, |
|
|
|
brenn, ach brenne doch nicht mehr. |
|
|
|
Ich empfinde nur Betrüben |
|
|
|
in dem unvergnügten Lieben. |
|
ELMIRA |
5 |
Liebesfeu'r, das mich verzehret, |
|
|
|
brenn, ach brenn noch eins so sehr. |
|
|
|
Ich empfinde kein Betrüben |
|
|
|
in dem höchst vergnügten Lieben. |
|
|
9b |
aria a due |
|
ELIATES |
1 |
Clerida, du hältst gefangen |
|
|
|
mein von Liebe mattes Herz. |
|
|
|
Soll ich keinen Trost erlangen? |
|
CLERIDA |
|
Ich kann nicht. ELIATES O herber Schmerz! |
|
CLERIDA |
5 |
Schau, Orsan, mein treues Lieben, |
|
|
|
schau, und gib verdienten Lohn. |
|
|
|
Willst du kein' Erkenntnis üben. |
|
ORSANES |
|
Ich kann nicht. CLERIDA O großer Hohn! |
|
ORSANES |
|
Laß dich doch, Elmir, erweichen, |
|
|
10 |
da ich bitte, seufz und fleh. |
|
|
|
Soll ich dann für Lieb erbleichen? |
|
ELMIRA |
|
Ich kann nicht! ORSANES Ach, ich vergeh! |
|
CLERIDA/ELIATES/ORSANES |
||
|
|
|
Lieb, ich merke dein Betören, |
|
|
|
alle Hoffnung ist nun fort, |
|
|
15 |
da ich muß das Urteil hören: |
|
|
|
ich kann nicht, Verzweiflung-Wort! |
|
|
|
|
|
|
|
Scena 10 |
|
|
|
Atis, Elcius, Vorige. Atis zeigt sich traurig. |
|
|
10a |
aria |
|
ELMIRA |
1 |
Traure nicht, traure nicht, |
|
|
|
meiner Seelen Lust und Wonne, |
|
|
|
was benebelt dein Gesicht, |
|
|
|
traure nicht, traure nicht! |
|
|
5 |
Laß mir glänzen meine Sonne, |
|
|
|
deiner Augen Freudenlicht! |
|
|
|
Traure nicht, traure nicht! |
|
|
10b |
recitativo |
|
|
|
Atis zeigt indessen seine Ungeduld, daß er nicht reden kann. |
|
ELCIUS |
1 |
Wo ich bei diesen Fackeln |
|
|
|
des Nachtes sehen muß, |
|
|
|
so wird mein trunkner Fuß |
|
|
|
im Dunkeln greulich wackeln. |
|
|
10a |
aria: la stanza seconda e terza |
|
|
1 |
Klage nicht! Klage nicht! |
|
|
|
Mich vergnügt dein treues Herze, |
|
|
|
ob die Zunge gleich nicht spricht. |
|
|
|
Klage nicht! Klage nicht! |
|
|
5 |
Es ersetzt der Augen Kerze, |
|
|
|
was dem stummen Mund gebricht. |
|
|
|
Klage nicht! Klage nicht! |
|
|
|
Elmira will abtreten. Atis hält sie und zeigt, daß er sich einiger |
|
|
|
Unbeständigkeit befürchte. |
|
|
|
Fürchte nicht! Fürchte nicht! |
|
|
|
Sei versichert, mein Erreter, |
|
|
10 |
meiner stets getreuen Pflicht. |
|
|
|
Fürchte nicht! Fürchte nicht! |
|
|
|
Hat man doch für stumme Götter, |
|
|
|
Dienst und Opfer angericht't. |
|
|
|
Fürchte nicht! Fürchte nicht! |
|
|
|
Atis und Elmira treten ab. |
|
|
10c |
recitativo |
|
ORSANES |
1 |
Orsanes, mußt du denn dem stummen Atis weichen? |
|
CLERIDA |
|
Ist meine Schönheit nicht Elmiren zu vergleichen? |
|
ELIATES |
|
Und kann ich, was Orsan verachtet, nicht erreichen? |
|
CLERIDA/ELIATES/ORSANES |
||
|
|
|
Muß denn die schwere Liebespein |
|
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5 |
noch durch Verspottung schwerer sein? |
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Scena 11 |
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Elcius. |
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11a |
recitativo |
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ELCIUS |
1 |
Hört, wie die Eulen |
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|
für lauter Liebe heulen. |
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|
Pfui Teufel, steht das wohl, |
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daß sich ein Kavalier |
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5 |
mit Federn und Rapier, |
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der nur von Hauen, Stechen, |
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Erschießen, Hälsebrechen |
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zu sagen wissen soll, |
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von Venus' kleinem Hurensohn, |
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10 |
dem Bärenhäuter, Erzkujon, |
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so lässet tribulieren, |
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daß er da in Figur, |
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wie eine alte Hur', |
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den Jammerton muß instuieren. |
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15 |
Ich hätte zehnmal lieber |
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ein starkes Ochsenfieber, |
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als daß ich an der Narren Seil |
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mit führte Liebesaffen feil, |
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viva le trink |
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20 |
Cappo, das ist ein schönes Ding |
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und steht mir besser an, |
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wenn ich bei einem guten Wein |
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ein Liedlein singen kann. |
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11b |
aria |
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ELCIUS |
1 |
Liebesschmerzen |
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|
geschlossener Herzen, |
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|
ei, wie macht ihr die Leute so toll! |
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Mir gibt edler Saft rheinischer Reben |
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5 |
ein lustiges Leben, |
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drum sauf ich mich voll. |
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Scena 12 |
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|
Königliches Zimmer. Croesus, Orsanes, Eliates und viele Kriegsbediente. |
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12 |
recitativo |
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CROESUS |
1 |
Darf Cyrus dann den Frieden brechen? |
|
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|
und ist ihm nicht bekannt, |
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|
|
daß meine nie verzagte Hand |
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|
das Höhnen und das Unrecht weiß zu rächen? |
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ELIATES |
5 |
Sein Volk ist in dem Krieg erfahren, |
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|
und mehr als unsre Scharen, |
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des Siegens längst gewohnt. |
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CROESUS |
|
Wir haben ihrer doch bei Babel nicht verschont, |
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|
an Mut und Macht soll mir's nicht fehlen, |
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10 |
wenn nur das Glück will unsre Seite wählen. |
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Scena 13 |
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|
Halimacus und Vorige. |
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13 |
recitativo |
|
HALIMACUS |
1 |
Es ist der Feind im Finstern dieser Nacht |
|
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|
so nah heran gerückt, |
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|
|
daß man ihn schon in Ordnung zu der Schlacht |
|
|
|
von unsres Lagers Wällen hat erblickt; |
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|
5 |
ganz Sardis ist empört |
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|
|
und merkt man, daß die Furcht sich bei jedem vermehrt. |
|
CROESUS |
|
Ist Er so kühn und hat er Lust zum Schlagen |
|
|
|
wohlan, wir wollen wagen |
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|
|
und seinen Frevel nach Verdienste strafen. |
|
|
10 |
Geschwind, gebt Helm und Waffen! |
|
HALIMACUS |
|
Der königliche Prinz wird mit mir nicht verweilen, |
|
|
|
dem Herren Vater nachzueilen, |
|
|
|
sein tapfrer Arm ersetzt des Munds Gebrechen, |
|
|
|
wann man ihn sieht mit seinem Schwerte sprechen. |
|
CROESUS |
15 |
Ihr, die ihr Ehr und Ruhm verlanget zu erwerben, |
|
|
|
folgt meinem kühnen Mut, |
|
|
|
mein purpurreiches Kleid will ich noch röter färben |
|
|
|
durch unsrer Feinde Blut. |
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|
|
Du aber, Eliat, |
|
|
20 |
verbleib, du sollst an meiner Statt, |
|
|
|
so lang ich diesen Krieg muß führen, |
|
|
|
mein Reich und diese Stadt regieren. |
|
|
|
Eliates neigt sich und empfängt den Regierungsstab. |
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Scena 14 |
|
|
|
Orsanes, Clerida. |
|
|
14a |
recitativo |
|
ORSANES (in tiefen Gedanken) |
||
|
|
1 |
Muß ich in meinem Herzen, |
|
|
|
auch diesen Hohn verschmerzen, |
|
|
|
daß Eliates mir wird vorgezogen |
|
|
|
zu solcher Ehr', so ist's um mich getan, |
|
|
5 |
mein Ehrsucht ist betrogen, |
|
|
|
mein Lieben wird verschmäht, was fängst du an, Orsan? |
|
|
|
Der König geht dem Feind entgegen, |
|
|
|
Prinz Atis folgt, Halimacus ingleichen. |
|
|
|
Vielleicht zeigt dir das Glück die Stund und das Vermögen, |
|
|
10 |
was du schon längst gehofft, anjetzo zu erreichen. |
|
|
|
Ich sehe Clerida, mein Unmut leidet nicht, |
|
|
|
ihr Klagen jetzo anzuhören. |
|
|
|
(geht ab.) |
|
CLERIDA |
|
Bleib nur, ich will dich nicht verstören, |
|
|
|
Grausamer, ach, du fliehest mein Gesicht. |
|
|
14b |
aria |
|
CLERIDA |
1 |
Liebe, treibst du denn nur Spiel |
|
|
|
mit verliebten Plagen? |
|
|
|
Deiner Martern sind zuviel, |
|
|
|
wer kann sie ertragen? |
|
|
|
|
|
|
|
Scena 15 |
|
|
|
Elcius, närrisch gewaffnet von vier Harlekinen begleitet, die seiner spotten. |
|
|
15a |
recitativo |
|
ELCIUS |
1 |
Seht, wie die elementschen Affen |
|
|
|
sich kitzeln über meine Waffen! |
|
|
|
Wie seid ihr närrisch oder voll, |
|
|
|
ich gläub, ihr werdet toll, |
|
|
5 |
wann's länger währt, es wird nicht taugen, |
|
|
|
ich schieß euch in die Augen |
|
|
|
Ho? So soll's anders stinken, |
|
|
|
was laßt ihr euch bedünken? |
|
|
|
Ich merke wohl, beim Schlapperment, |
|
|
10 |
daß ihr mich noch nicht kennt, |
|
|
|
und wißt nicht, daß ich führ, |
|
|
|
den Caractèr von Offizier. |
|
|
|
Den Persern, den Canaille, |
|
|
|
mag nur für meine Fäuste grausen, |
|
|
15 |
wie werd ich ihre Pelze lausen, |
|
|
|
à la Bataille, à la Bataille. |
|
|
15b |
aria |
|
ELCIUS |
1 |
Das Blinkern und Flinkern und Klinkern der Waffen, |
|
|
|
kann Schrecken erwecken nur Gecken und Affen, |
|
|
|
wer spüret und führet ein männliches Herz, |
|
|
|
wird kriegen und siegen mit Lachen und Scherz. |
|
|
15c |
entrée von harlekinen |
|
|
|
|
|
|
|
Scena 16 |
|
|
|
Der Schauplatz zeigt im Vorderteil Cyrus' und von weitem Croesus' Lager. |
|
|
16a |
aria |
|
CYRUS |
1 |
Laß ich meine siegenden Waffen nur sehen, |
|
|
|
die Fahnen nur wehen, |
|
|
|
erzittern, erschüttern, erbleichen, entweichen |
|
|
|
die meine Macht dürften verschmähen, |
|
|
5 |
ich führe das flüchtige Glück |
|
|
|
gefangen am Strick. |
|
|
16b |
recitativo |
|
CYRUS |
1 |
Ihr Helden, folget dann, die Stund ist nun gekommen, |
|
|
|
da jeder seine Treu und Tugend lässet sehn; |
|
|
|
der Feind, von Müßiggang und Wollust eingenommen, |
|
|
|
wird unsrer Tapferkeit nicht können widerstehn; |
|
|
5 |
wir dürfen sicher sein, daß er muß unterliegen, |
|
|
|
und für uns eines ist das Kämpfen und das Siegen. |
|
|
|
Die Trompeten und Trommeln lassen sich von beiden Seiten hören. |
|
CROESUS |
|
Frisch auf, uns ruft von weitem der frohe Kriegesschall, |
|
|
|
ein jeder gebe dann den Tapfern Widerhall, |
|
|
|
zum Waffen, zum Streiten! |
|
CHORUS [beider Armeen] |
||
|
|
10 |
Zum Waffen, zum Streite! |
|
|
|
Darauf folgt die Schlacht, worin zuletzt die Perser obsiegen und |
|
|
|
die Lydier die Flucht nehmen. |
|
|
16c |
ballett von persischen soldaten |
|
|
|
|
|
|
|
Scena 17 |
|
|
|
Croesus flüchtig ohne königliche Kleidung, ein persischer Hauptmann mit |
|
|
|
Soldaten, folgends Atis und Halimacus. |
|
|
17 |
recitativo |
|
CROESUS |
1 |
Der Perser Schwert und Pfeile |
|
|
|
sind Blitz und Donnerkeile, |
|
|
|
da keine Macht kann widerstehn. |
|
|
|
Es ist nunmehr um mich und dieses Reich geschehn, |
|
|
5 |
ich muß nur in der Flucht mein Heil versuchen. |
|
|
|
Ihr Götter, Sterne, Glück, sollt' ich euch nicht verfluchen. |
|
HAUPTMANN |
|
Ein Lydier! stirb, stirb! ATIS Es ist der König, halt, |
|
ATIS |
|
erschlag ihn nicht! |
|
HALIMACUS |
|
Ach welch Entsetzen! |
|
|
10 |
wie! Atis spricht? |
|
HAUPTMANN |
|
Der König? welch Ergötzen! |
|
|
|
so ist er dann in unserer Gewalt! |
|
|
|
(Führen ihn gefangen hinweg!) |
|
ATIS |
|
Ach, ich erstick' im Blut! |
|
|
|
(Wirft häufig Blut aus.) |
|
HALIMACUS |
|
Wir müssen eiligst nur die Flucht ergreifen, |
|
|
15 |
weil's hier nicht sicher ist für unsrer Feinde Streifen. |
|
ATIS |
|
Wie kränkt es meinen Mut, |
|
|
|
daß ich den Vater muß |
|
|
|
gefangen hinterlassen. |
|
HALIMACUS |
|
So will's des Himmels Schluß, |
|
|
20 |
darum ist nur Geduld zu fassen. |
|
ATIS |
|
Mich Unglückseligen, |
|
|
|
da mein gefangner Mund der Bürde wird befreit, |
|
|
|
führt man den Vater hin in Band' und Dienstbarkeit. |
|
|
|
|
|
|
|
Scena 18 |
|
|
|
Man sieht von weitem der Lydier verheertes Lager, und das Feld von |
|
|
|
Erschlagenen bedeckt. Cyrus zu Pferde, umgeben von seinen Hauptleuten, |
|
|
|
und gefolgt von Soldaten und vielen gefangenen Lydiern, triumphierend |
|
|
|
unter fröhlichem Trompeten- und Pauken-Schalle. |
|
|
18a |
ritornello ed aria |
|
CYRUS |
1 |
So jauchzet mein fröhlicher Mut! |
|
|
|
So führ ich die siegenden Zeichen |
|
|
|
auf Hügel von Leichen |
|
|
|
durch Ströme von Blut. |
|
|
|
Ritornello mit Trompeten und Pauken. Croesus wird in Ketten herzu geführt. |
|
|
18b |
recitativo |
|
HAUPTMANN |
1 |
Hier ist die reichste Beute, |
|
|
|
die wir in diesem Streite |
|
|
|
verhofften zu erlangen, |
|
|
|
wir führen Croesus selbst gefangen. |
|
CYRUS |
5 |
O unverhoffte Freude! |
|
|
|
So hat dich, Croesus, dann die Abgrundsgruft verschlungen, |
|
|
|
die du gegraben hast, |
|
|
|
und drückt dich selbst die Last |
|
|
|
vom stolzen Hohngebäude, |
|
|
10 |
das du hast aufgeführt. |
|
|
|
Was Rasen kam dich an, |
|
|
|
daß du nach Unglück selbst gerungen, |
|
|
|
wie ganz Assyrien gerebelliert? |
|
|
|
Du hast sie wider mich erreget |
|
|
15 |
und bist, wie sie, aufs Haupt erleget, |
|
|
|
mir durch die Flucht entsprungen; |
|
|
|
jetzt kommt und folgt dir näher nach |
|
|
|
mein und der Götter Rach'! |
|
CROESUS |
|
Ich muß den Göttern weichen. |
|
CYRUS |
20 |
Den Göttern und auch mir ingleichen. |
|
CROESUS |
|
Nicht dir, nur deinem Glücke. |
|
CYRUS |
|
Schau deine Band und Stricke. |
|
CROESUS |
|
Ich bin ein König. CYRUS Ja, |
|
CYRUS |
|
dennoch mein Feind, |
|
|
25 |
der es mit mir nicht redlich hat gemeint. |
|
CROESUS |
|
Der stolze Hochmut nimmt dich ein, |
|
|
|
halt Kön'ge königlich, willst du ein König sein. |
|
CYRUS |
|
Der Himmel machet mich zum Überwinder. |
|
CROESUS |
|
Willst du im Glück so hoch den Bogen spannen, |
|
|
30 |
machst du dich selber zum Tyrannen. |
|
CYRUS |
|
Sklav', rede was gelinder; |
|
|
|
weg! führet ihn hinein! |
|
CROESUS |
|
Halt Kön'ge königlich, willst du ein König sein. |
|
|
18c |
ritornello ancora |
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
ATTO II |
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
Scena 1 |
|
|
1a |
ritornello |
|
|
|
Bauren-Hütten. Ein Bauer, eine Bäuerin, zwei Baurenkinder, zweene Bauern, |
|
|
|
welche auf Schalmeien und Sackpfeifen spielen. |
|
|
1b |
aria a due |
|
|
|
I. |
|
BÄUERIN/BAUER |
Kleine Vöglein, die ihr springet, |
|
|
|
|
zwitschert, singet |
|
|
|
auf den Sträuchen hie und da, |
|
|
|
Die Kinder wiederholen. |
|
|
|
fliehet für des Voglers Pfeifen, |
|
|
5 |
euch zu greifen, |
|
|
|
zu beschleichen ist er nah. |
|
|
|
II. |
|
|
|
Zarte Hinden, die ihr graset, |
|
|
|
scherzet, raset |
|
|
|
in den Gründen hie und da, |
|
|
10 |
flieht, der Jäger, euch zu hetzen, |
|
|
|
ist mit Netzen, |
|
|
|
Strick und Winden gar zu nah. |
|
|
|
|
|
|
|
Scena 2 |
|
|
|
Atis, Halimacus, Vorige, welche in ihrer Arbeit dieser nicht Gewahr werden. |
|
|
2a |
recitativo |
|
ATIS |
1 |
Orsanes treulos? HALIMACUS Ja, und wie ein Strick |
|
HALIMACUS |
|
nicht wird von einem Garn gemacht, |
|
|
|
so fürcht' ich, daß er schon durch lose Tück' |
|
|
|
auf seine Seit' auch andre mehr gebracht. |
|
ATIS |
5 |
Untreue Diener -- |
|
|
|
das Heer geschlagen -- |
|
|
|
der König selbst gefangen -- |
|
|
|
ach Himmel, mußt' ich nur die Sprach erlangen, |
|
|
|
mein Unglück zu beklagen? |
|
HALIMACUS |
10 |
Des Königs Freiheit muß man kaufen |
|
|
|
und die zerstreuten Scharen |
|
|
|
nach Möglichkeit zusammenführen. |
|
|
|
Das meiste ist noch zu befahren, |
|
|
|
von dem treulosen Haufen, |
|
|
15 |
die mit Orsan geneigt zum Rebellieren. |
|
|
|
Indessen halt' ich Nutz zu sein, |
|
|
|
damit der Aufruhr nicht durch deine Sprach' erwache, |
|
|
|
der jetzt noch schläft in Sicherheit, |
|
|
|
daß man die Wohltat noch zur Zeit |
|
|
20 |
nicht kundbar mache, |
|
|
|
die du vom Himmel hast genossen, |
|
|
|
daß dir der stumme Mund erschlossen. |
|
ATIS |
|
Soll ich die Gnad' undankbar dann verschweigen, |
|
|
|
so mir die Götter zeigen? |
|
HALIMACUS |
25 |
Du kannst die Dankbarkeit in stillen Herzen hegen, |
|
|
|
bis sich der Sturm des Aufruhrs erst wird legen. |
|
ATIS |
|
Meinst du, daß Atis schweigen kann, |
|
|
|
um nicht Elmir die Zeitung selbst zu bringen, |
|
|
|
daß ihn der Himmel so beglücket hat? |
|
HALIMACUS |
30 |
Vernunft muß diesen Liebestrieb bezwingen. |
|
ATIS |
|
Mir fället etwas ein, |
|
|
|
weil ich hier Landvolk sehe. |
|
HALIMACUS |
|
Sag an, was soll es sein? |
|
ATIS |
|
Ich will mich selbst verhüllen |
|
|
35 |
in schlechte Baurentracht |
|
|
|
und sagen, daß ich armer Knabe |
|
|
|
von Atis sei gefangen, |
|
|
|
der mich Elmiren schick' zur Gabe, |
|
|
|
weil die Natur mich ihm so gleich gemacht, |
|
|
40 |
es wird die Sprache den Betrug erfüllen, |
|
|
|
ich unbekannt dadurch erlangen, |
|
|
|
Elmir zu sehn, und kann daneben |
|
|
|
auf der Rebellen Händel Achtung geben. |
|
|
|
(Wenden sich zu den Bauren, die erschrecken.) |
|
HALIMACUS |
|
Glück zu, ihr lieben Leut! |
|
BAUER |
45 |
Habt Dank, ihr Gnaden. |
|
HALIMACUS |
|
Ihr dürft euch nicht entsetzen, |
|
|
|
wir wollen euch nicht schaden, |
|
|
|
wir suchen nur ein schlechtes Baurenkleid |
|
|
|
zu tauschen mit den reichen Schätzen, |
|
|
50 |
die ihr an diesem Kleide spüret. |
|
BAUER |
|
Wir tun, was uns gebühret. |
|
|
|
(Gehen mit den Alten in die Baurenhütte.) |
|
|
|
|
|
|
|
Scena 3 |
|
|
|
Elcius in possierlicher persischer Kleidung. Baurenkinder. |
|
|
3a |
recitativo |
|
ELCIUS |
1 |
Seht, wie Herr Elcius |
|
|
|
ist ein Politikus |
|
|
|
und hängt, um sein Gelück zu schaffen, |
|
|
|
den Mantel nach dem Winde, |
|
|
5 |
da alles leider |
|
|
|
ging übern Haufen |
|
|
|
und jeder fiel an's Laufen, |
|
|
|
war ich geschwinde |
|
|
|
und stahl mir diese Kleider |
|
|
10 |
von einem toten Affen, |
|
|
|
dadurch ist Elcius gemetamorphorosiert, |
|
|
|
daß er vor einen Perser jetzt passiert. |
|
|
|
(Wird der Baurenkinder gewahr.) |
|
|
|
Was mach, ihr lieben Kinder, |
|
|
|
darf wohl ein armer Schinder |
|
|
15 |
bei euch die matten Glieder |
|
|
|
zur Ruhe legen nieder? |
|
BAURENKIND |
|
Willst du dich zu uns setzen, |
|
|
|
so wollen wir in deiner Ruh |
|
|
|
mit einem Liedlein dich ergötzen. |
|
ELCIUS |
20 |
Tut das! Ich höre zu. |
|
|
3b |
aria ed ritornello |
|
|
|
I. |
|
BAURENKIND |
1 |
Mein Kätchen ist ein Mädchen, |
|
|
|
der jede weichen muß, |
|
|
|
wenn ich sie bei den Schafen |
|
|
|
oft finde ruhig schlafen, |
|
|
5 |
geb' ich ihr manchen Kuß. |
|
|
|
Mein Kätchen ist ein Mädchen, |
|
|
|
der jede weichen muß, |
|
|
|
II. |
|
|
|
Das Kindchen hat ein Mündchen |
|
|
|
so süß wie eine Nuß, |
|
|
10 |
wenn man das Mündchen lecket, |
|
|
|
so schmecket, ach, so schmecket |
|
|
|
wie Zucker jeder Kuß. |
|
|
|
Das Kindchen hat ein Mündchen |
|
|
|
so süß wie eine Nuß, |
|
|
|
III. |
|
|
15 |
Es prangen ihre Wangen |
|
|
|
in Schönheit Überfluß, |
|
|
|
die geilen Lüftlein spielen, |
|
|
|
dran ihre Brunst zu kühlen |
|
|
|
und rauben manchen Kuß. |
|
|
20 |
Es prangen ihre Wangen |
|
|
|
in Schönheit Überfluß, |
|
|
|
Elcius singt zuletzt mit und tanzt. |
|
|
3c |
recitativo |
|
ELCIUS |
1 |
Ich sollte schier mein Unglück ganz vergessen, |
|
|
|
da doch der leere Magen |
|
|
|
den Hunger nicht mehr kann ertragen, |
|
|
|
weil ich den ganzen Tag noch nicht gegessen, |
|
|
5 |
was fang' ich armer Teufel an, |
|
|
|
wo ich das Brot nicht betteln kann, |
|
|
|
so muß ich wohl von Hunger sterben, |
|
|
|
sonst weiß ich nichtes zu erwerben. |
|
|
3d |
ballett von bauern und bauernkindern |
|
|
|
|
|
|
|
Scena 4 |
|
|
|
Königlicher Vorhof mit einem Fischteiche. Clerida, Elmira. |
|
|
4 |
aria a due |
|
ELMIRA |
1 |
Freundliche Liebe, wie freust du mein Herz! |
|
|
|
Elmira setzt sich zu fischen mit einer Angel. |
|
|
|
Ferne von Leiden |
|
|
|
leb' ich in Freuden, |
|
|
|
Lachen und Scherz. |
|
CLERIDA |
5 |
Feindliche Liebe, wie quälst du mein Herz! |
|
|
|
Ich muß ertragen |
|
|
|
tödliche Plagen, |
|
|
|
Eifer und Schmerz. |
|
|
|
|
|
|
|
Scena 5 |
|
|
|
Orsanes, Clerida, Elmira, die fischt. |
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5a |
recitativo |
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CLERIDA |
1 |
Kann meine Treu Orsanen nicht bewegen? |
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ORSANES |
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Ich komm hier um Elmir, nicht deinetwegen. |
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Wendet sich zu Elmira. |
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5b |
aria |
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1 |
Mein Elmir, |
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meine Wonne, |
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mein Elmir, |
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meine Sonne, |
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5 |
meiner Seelen |
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Freud' und Wonne, |
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ist bei dir |
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für mich Armen |
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kein Erbarmen? |
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5c |
recitativo |
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CLERIDA |
1 |
Nimm Clerida und laß Elmir. |
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ORSANES |
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Ich rede nichts mit dir! |
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5d |
aria |
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Elmira fährt fort im Fischen, sich stellend, als höre sie Orsanes nicht. |
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ELMIRA |
1 |
Ihr stummen Fische seid |
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dem gleich, den ich muß lieben, |
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der ist auch stumm geblieben. |
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Doch merkt den Unterschied: |
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5 |
ihr liebt in kalter Flut, |
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er stets in heißer Glut. |
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5e |
recitativo |
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ORSANES |
1 |
Du stellest dich, als hörst du nicht, |
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wie! oder meinest du, es werde sich gebühren, |
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weil Atis' stummer Mund nicht spricht, |
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daß du mußt dein Gehör verlieren? |
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ELMIRA |
5 |
Schau Clerida, die dir schon Antwort gibet. |
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ORSANES |
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Ich rede nicht mit ihr. |
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ELMIRA |
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Ich höre nicht nach dir. |
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CLERIDA |
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Lieb' doch, Orsanes, die dich liebet. |
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EMIRA |
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Sie ist ja mehr als liebenswert, |
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10 |
und ich bin dir vom Himmel nicht beschert. |
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ORSANES |
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Werd ich so hart betrübet? |
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ELMIRA/CLERIDA |
Lieb' doch, Orsanes, die dich liebet. |
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