| Der hochmütige, gestürzte und wieder erhabene CROESUS. Musikalisches Schauspiel. Libretto: Lucas von Bostel. Muziek: Reinhard Keiser. Hamburg, Theater am Gänsemarkt, 1711 / 1730. (Jeroen Fonteyn) |
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Bijlage 1


Bijlage 2
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CROESUS: LIBRETTO |
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LUCAS VON BOSTEL |
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ATTO I |
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Scena 1 |
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Der Schauplatz stellet vor einen prächtigen Saal und herrlichen Thron. |
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Croesus auf dem Thron. Orsanes, Eliates, Halimacus und viele andere |
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lydische Staats- und Kriegsbediente, alle knieend; Solon allein stehend. |
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1a |
coro |
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ALLE |
1 |
Croesus herrsche, Croesus lebe, |
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daß der Glanz von seinem Glücke |
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macht- und hoheitsstolze Blicke |
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um den ganzen Erdkreis gebe. |
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1b |
recitativo |
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CROESUS |
1 |
Ihr edlen Lydier, getreue Untertanen, |
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ich hoffe, daß durch eure Tapferkeit |
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ihr mir den Weg nach dieser Zeit |
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zum Götterstande werdet bahnen. |
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5 |
Indessen nehm ich gnädigst an |
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die Lieb und Treu, so ich hie spüren kann. |
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(Winkt, daß sie sich aufrichten sollen, und wendet sich zu Solon.) |
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Nur Solon traurt allein, |
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und hat der helle Schein |
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von meiner Macht und Herrlichkeit |
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10 |
ihn niemals noch erfreut? |
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SOLON |
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Den glänzenden Kristall |
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zerbricht ein Unglücksfall. |
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CROESUS |
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Hat Solon nicht gesehn |
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die vielen Kriegesscharen, |
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15 |
die mir zu Dienste stehn |
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und meinen Thron bewahren? |
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SOLON |
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Es können die Ameisen |
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noch viel mehr Scharen weisen. |
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CROESUS |
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Schau an die reiche Wand, |
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20 |
das prächtige Gebäude, |
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bedeckt mit lauter Seide |
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durch kunsterfahrne Hand. |
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SOLON |
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Ist das denn deine Pracht, |
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die dir ein Würmlein macht? |
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CROESUS |
25 |
Es zeiget dir mein Reich |
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den Kern von tapfern Leuten, |
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die mir hier stehn zur Seiten. |
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SOLON |
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Der Tod macht alle gleich. |
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CROESUS |
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Schau, wie das Gold an meinem Zepter prahlt |
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30 |
und mir sein Glanz die Hand bestrahlt. |
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SOLON |
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Das Gold ist nur ein Raub, |
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der Erde Gruft entführet, |
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die Hand, damit gezieret, |
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ist nichts als Asch' und Staub. |
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CROESUS |
35 |
Wird alle diese Pracht |
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von dir sogar verlacht, |
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laß meine Schätze sehen! |
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Die Türen der Schatzkammer werden aufgetan. |
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Schau, Solon, schau, tritt näher hin |
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und sag, ob ich nicht glücklich bin. |
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40 |
Schau! SOLON Es ist gnug geschehen! |
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(siehet nur ein wenig hin und wendet sich alsobald wieder um.) |
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CROESUS |
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Kann nicht, der das besitzt, glückselig heißen? |
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SOLON |
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Du irrest weit, |
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meinst du, dies sei Glückseligkeit? |
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Du bist nicht Herr der Schätz und Güter |
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45 |
es setzet dich das Glück |
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darüber nur zum Hüter, |
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und kann ein Unglücksblick |
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dir alles wiederum entreißen. |
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(geht ab.) |
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CROESUS (vom Throne absteigend) |
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Geh hin mit deinen Lehren, |
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50 |
die mir verdrießlich sind zu hören. |
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1c |
aria |
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CROESUS |
1 |
Prangt die allerschönste Blume |
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nicht mehr mit der Schönheit Ruhme |
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wenn die welken Blätter fließen |
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sollte man die kurze Zeit |
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5 |
ihrer schönen Lieblichkeit |
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darum nicht mit Lust genießen? |
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Scena 2 |
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Königlicher Garten. Elmira und Trigesta. |
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2a |
aria |
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ELMIRA |
1 |
Hoffe noch, gekränktes Herz! |
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Furcht und Schmerz, |
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warfen mein Vertrauen nieder. |
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Doch die Liebe tröstet mich, |
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5 |
tröstet und erhebt mich wieder. |
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Manchmal folgt auf bange Triebe |
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plötzlich wieder Lust und Scherz. |
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Hoffe noch, gekränktes Herz! |
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2b |
recitativo |
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ELMIRA |
1 |
Du weißt, wie Cyrus' Macht |
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ganz Medien hat überschwommen, |
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die wertste Mutter als verwitt'bte Königin |
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von Reich und Thron gebracht, |
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